Madhya Pradesh

बालाघाट वन विकास निगम में बाल श्रम और भ्रष्टाचार का बड़ा खेल_ ,कलेक्टर से शिकायत के बाद भी रेंजर पर मेहरबान क्यों हैं आला अधिकारी? 12 दिन में 2.89 लाख का फर्जी भुगतान, नाबालिगों से कराई मजदूरी

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संवाद समृद्धि पथ पवन कश्यप बालाघाट
लामता, बालाघाट। मध्य प्रदेश राज्य वन विकास निगम की लामता परियोजना में सरकारी पैसों की बंदरबांट और नियमों को खुलेआम ताक पर रखने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। लामता परियोजना के तहत कक्ष क्रमांक 1183, बीट घुनाड़ी में चारागाह विकास और रहवास कार्य के नाम पर न सिर्फ लाखों रुपये का घपला किया गया, बल्कि मासूम नाबालिग बच्चों से मजदूरी कराने का भी गंभीर आरोप लगा है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि 1 जून 2026 को कलेक्टर कार्यालय में लिखित शिकायत दर्ज होने के बावजूद अब तक जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। इससे विभाग की कार्यशैली और नीयत पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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बाल श्रम और फर्जी हाजिरी का बड़ा फर्जीवाड़ा
स्थानीय सूत्रों और शिकायतकर्ता के अनुसार बीट घुनाड़ी में वास्तविक काम ग्राम बुढ़िया गांव के मजदूरों और उनके नाबालिग बच्चों से कराया गया। काम तो इन लोगों ने किया लेकिन भुगतान उनके माता-पिता के खाते में डाला गया।

वहीं कागजों में हाजिरी दूसरे गांव के लोगों के नाम पर चढ़ा दी गई। एक तरफ शासन बाल श्रम उन्मूलन के बड़े-बड़े दावे करता है, वहीं दूसरी तरफ वन विकास निगम की नाक के नीचे नाबालिगों से कड़ी मजदूरी कराई जा रही है। शिकायत में आरोप है कि वास्तविक मजदूरों का नाम छुपाकर और दूसरे गांव के लोगों के नाम पर फर्जी मस्टर रोल तैयार कर कुल ₹2,89,563 की राशि हड़प ली गई। सवाल उठ रहा है कि आखिर बाल श्रम विभाग कहां सो रहा है? क्या मासूमों से काम कराने वालों पर कोई कानून लागू नहीं होता? मात्र 12 दिन में लाखों का भुगतान, कागजों पर ही हुआ काम?
शिकायत में दर्ज है कि 18 मार्च 2026 से 30 मार्च 2026 यानी मात्र 12-13 दिनों के भीतर इतनी बड़ी रकम का भुगतान दर्शाया गया है। इतने कम समय में सीमांकन, सफाई और खरपतवार उन्मूलन का काम धरातल पर संभव है या यह सब केवल कागजों में सरकारी खजाना लूटने का हथकंडा है, यह जांच का विषय है। ग्रामीणों का कहना है कि जमीनी स्तर पर न तो इतना काम हुआ और न ही इतने मजदूर लगे, फिर भी भुगतान फर्जी तरीके से निकाल लिया गया।

रेंजर पर सीधे आरोप, जांच क्यों ठंडे बस्ते में?
इस पूरे मामले में लामता परियोजना के परिक्षेत्र अधिकारी रेंजर राजेंद्र प्रसाद जरघे पर भ्रष्टाचार के सीधे आरोप लगे हैं। शिकायत के महीनों बीत जाने के बाद भी कोई निष्पक्ष जांच नहीं हुई। स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ता का सवाल है – वन विकास निगम जांच से क्यों डर रहा है?क्या रेंजर को बचाने की कोशिश हो रही है? क्या इस भ्रष्टाचार के खेल में संभागीय अधिकारी भी बराबर के हिस्सेदार हैं? अगर रेंजर निर्दोष हैं तो विभाग निष्पक्ष जांच कराने से पीछे क्यों हट रहा है?

कलेक्टर को शिकायत, अब तक नहीं पहुंची जांच टीम
ग्राम कोचेवाड़ा निवासी लेखराम साकुरे ने 1 जून 2026 को कलेक्टर कार्यालय में लिखित शिकायत सौंपी थी। लेकिन अब तक जमीनी स्तर पर कोई जांच टीम नहीं पहुंची है। पीड़ित मजदूरों और ग्रामीणों में इसको लेकर भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का आरोप है कि असली हकदारों को मजदूरी नहीं मिली और बच्चों से काम लेकर भी उनका शोषण किया गया।

अब प्रशासन क्या करेगा?
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और बाल श्रम विभाग इस फर्जीवाड़े और मासूमों के शोषण पर कब जागते हैं। या फिर वन विकास निगम के भ्रष्ट अधिकारियों को इसी तरह अभयदान मिलता रहेगा। फिलहाल पूरे मामले ने वन विकास निगम की पारदर्शिता और बाल श्रम कानूनों के क्रियान्वयन पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

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